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Thursday, February 2, 2012

क्या डॉ. शंकर दयाल एकमात्र दोषी हैं?

सबसे पहले दिवंगत कर्मचारी को श्रद्धांजली। रेल्वे के रनिंग स्टॉफ के एक कर्मचारी को आपात अवस्था में अस्पताल लाया जाता है, डॉक्टर को उनके घर से तत्काल बुलाया जाता है, पर तत्काल की भी अपनी एक सीमा होती है और डॉक्टर होने की भी, क्योंकि डॉक्टर केवल जीवन बचाने का अपना ईमानदार प्रयत्न कर सकते हैं उनकी ईमानदारी पर भी प्रश्नचिन्ह लगाया जा सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय तो सर्वशक्तिमान पर ही निर्भर होता है। इस बात का निर्णय कौन ले सकता है की डॉक्टर को आने में जितना समय लगा और लाये गये मरीज की हालत कितने प्रतिशत गंभीर थी? जिसे कोई डॉक्टर सामने होने पर भी बचा पाता? कई बार अस्पतालों मे ऐसा देखने मे आया है कि डॉक्टर सभी आवश्यक उपकरणों समेत सामने मौजूद होने पर भी और उनके ईमानदार प्रयत्न के बावजूद भी मौत को मात नहीं दी जा सकी। क्या केवल एक घटना मात्र से किसी डॉक्टर को दोषी ठहराया जा सकता है। हमें ये नहीं भूलना चाहिये की डॉक्टर भी एक मनुष्य मात्र है। क्या उस डॉक्टर के व्दारा किये जाने वाले अन्य उपलब्धीपूर्ण कार्यों को नजर अंदाज किया जा सकता है? क्या रेल्वे में डॉक्टरों के 86 रिक्त पदों को तत्काल भरने के बारे में रनिंग स्टॉफ ने किसी आंदोलन की बात की? डॉक्टर किन परिस्थितियों में कार्य कर रहें हैं इसका किसी ने कोई संज्ञान लिया है? क्या अस्पताल प्रशासन की संपूर्ण व्यवस्था पर यूनियनों की ओर से कभी कोई सर्वे हुआ है? आपात परिस्थितियों में मरीज के परिजन और साथियों का आक्रोश भी अपनी जगह बहुत ही स्वाभाविक है। अपने आदमी के चले जाने के भय मात्र से परिजनों का व्यवहार असामान्य हो जाता है और सामने केवल अस्पताल के कर्मचारी होते हैं, सभी कुछ बहुत ही स्वाभाविक है। क्या हडतालें, धमकियॉं, आंदोलन एकमात्र उपाय बच गया है?
    रनिंग स्टॉफ के कर्मचारीयों के व्दारा आपत्ती ली गई कि डॉक्टर उस समय घर पर मरीजों को देख रहे थे। क्या रनिंग स्टॉफ अपनी ड्यूटी पर रहते हुए कोई ऐसा कार्य नहीं करते जो नियमों के विपरीत हो? उस पर ये धमकी कि यात्रियों की फज़ीहत कर सारी ट्रेनों की संचालन व्यवस्था में व्यवधान उत्पन्न किया जायेगा ! क्या तर्कसंगत, विवेकपूर्ण लगता है? क्या किसी भी स्थिति में पूरे प्रशासन को ब्लेकमेल करने की धमकी या हडताल की धमकी बस यही हमारा देश के प्रति दायित्व रह गया है? सवाल केवल यही है कि सभी देशवासी अपनी-अपनी नैतिकता को परखें? दूसरों के दोष को प्रचारित करने से अपने दोष कम नहीं हो जाते। डॉक्टरों के साथ साथ संपूर्ण रेल्वे स्टॉफ को भी चाहिये की वे अपने-अपने दायित्वों का निर्वाह पूरी ईमानदारी से करें तभी देशवासी एक दूसरे पर भरोसा कर पायेंगे।

Saturday, October 1, 2011

केन्द्रीय विद्यालयः शराबी शिक्षक ने क्लास से करवाया गरबा।

केन्द्रीय विद्यालय रतलाम में गणित पढ़ाने वाले शिक्षक लौह खरे ने सरेआम क्लास मे शराब को शीतल पेय की बोतल में भरकर पीते हुए आकर बच्चों से कहा की नवरात्री चालू हो गई है सब बच्चे आज गरबा करेंगे। कक्षा छटी के सभी बच्चे अपने शिक्षक के इस रूप को देखकर घबरा गये। उन्होंने सर से पढ़ाने की अपील करने पर सर ने सभी को संस्कृत की किताब निकालने के लिये कहा। इस पर बच्चों ने कहा की सर लेकिन आप तो हमें गणित पढ़ाते हैं इस पर तथाकथित सर ने कहा की ठीक है तो फिर गणित की किताब निकाल लो कहते हुए कुर्सी पर पसर कर सो गये। बाद में पूरी क्लास के बच्चों ने प्रिंसिपल से इस की शिकायत की तब प्रिंसिपल ने स्वयं इस शिक्षक को हाथ पकडकर क्लास से ले जाकर अपने आफिस के बाहर बैठने को कहा। उल्लेखनीय है कि उक्त शिक्षक का ट्रांसफर हो चुका है लेकिन उनके स्थान पर आने वाले शिक्षक ने अभी जाईन नहीं करने से सारा माजरा बिगड रहा है।
क्या केंद्रिय विद्यालय संगठन इस अनुसुचित जाति शिक्षक के आचरण पर कोई कार्यवाही करेगा?
केंद्रिय विद्यालय में पढने वाले छात्र-छात्राओं के पालकों को, अन्य सामाजिक संगठनों को इस बारे में तत्काल ध्यान देना चाहिये और लगातार बच्चों के संपर्क में रहकर न केवल विद्यालय विशेष बल्कि रतलाम के सभी विद्यालयों की रोजमर्रा होने वाली घटनाओं की और ध्यान देना चाहिये।

Tuesday, August 30, 2011

विद्युत मंडल की मुनादी!

मध्यप्रदेश पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड ने पिछले दिनों एक मुनादी शहर भर में करवाई है कि जिन विद्युत उपभोक्ताओं ने माह अगस्त के बिल नहीं भरे हैं अगस्त माह की अंतिम तिथी तक अपना बकाया भर दें। अन्यथा बकायादारों के     खिलाफ कार्यवाही की जाकर उन्हें पुनः कनेक्शन चार्ज रूपये 200 अतिरिक्त भरना होगा।

मान लिजिये रतलाम शहर में 100 विद्युत उपभोक्ता हैं इनमंे से 80 उपभोक्ता अपने नियत समय में बिल का भुगतान कर देते हैं तो उन सभी सम्माननीय उपभोक्ताओं के कानों में इस प्रकार के ध्वनी प्रदुषण, मुनादी  पिटवाने का क्या औचित्य?
  • बकायादारों की संख्या, कुल उपभोक्ताओं के 25 प्रतिशत से अधिक हो तो ही शासन मुनादी की अनुमति दे।
  • सभी बकायादारों के नाम, पते वेबसाईट पर सार्वजनिक किये जायें।
  • फोन पर या  एसएमएस के माध्यम से उन्हें व्यक्तिगत अवगत कराया जावे।
  • व्यक्तिगत नोटिस जारी करते हुए उन्हें दण्ड सहित एक नियत तिथी तक ही मान्य किया जावे।
  • वेब साईट पर अद्यतन कुल उपभोक्ताओं की संख्या और बकायादारों की संख्या (कनेक्शन टाईप से) जारी की जाये।
  • ध्वनि प्रदुषण का ध्यान रखते हुए इस प्रकार की अन्य सभी मुनादीयों को भी अनुमति देने के पहले सोचा जाये।
मुनादी के कुछ अनकहे पहलु
  • बकायादारों का बकाया वसूल कर पाने में कंपनी स्वयं की असफलता मुनादी के रूप में कर रही है।
  • असली बकायादारों के कानों पर इसके बाद भी जूं नहीं रेंगने वाली, ऐसा होता तो बकाया ही क्यों होता।
  • क्या कंपनी अपनी और से 24 घंटे अबाधित विद्युत वितरण कर रही है और वो किसी भी प्रकार से फाल्ट पर नहीं है? यदि है तो उसके खिलाफ कौन मुनादी करवायेगा?


Saturday, August 27, 2011

ऑफिस-ऑफिस: ड्रायविंग लायसेंस रिन्यूवल की एक भ्रष्ट कथा

श्री मनोहर वर्मा, रतलाम  से प्राप्तः
    सुबह आठ बजे हमें मोबाईल पर एक एसएमएस आया, आपके ड्रायविंग लायसेंस रिन्यूवल का समय आ गया है, आप सोच रहे हैं ऐसा एसएमएस हमें तो नहीं मिला आज तक!  बिल्कुल ठीक, यातायात विभाग की और से ऐसा कोई एसएमएस नहीं भेजा जाता वो तो हमने इंटरनेट की उन ठेरों वेब साईटस् में से एक पर अपने खुद के लिये ये रिमांइडर सेट किया था जो इस प्रकार की सुविधा देती है। खैर, हमने तुरंत अपना ड्रायविंग लायसेंस निकालकर चेक किया, बिल्कुल सही आखरी सात दिन शेष थे।
    लगभग ग्यारह बजे यातायात विभाग का कार्य देखने वाले एक एजेंट के कार्यालय में जाकर पूछताछ की, एक साधारण से दोपहिया के ड्रायविंग लायसेंस रिन्यूवल का चार्ज रूपये 500/- बताया गया। साथ में तीन पासपोर्ट फोटो भी लाने के लिये कहा गया। वहॉं से सीधे सायबर केफे पर जाकर डिपार्टमेंट ऑफ ट्रांसपोर्ट की बेब साईट http://www.mptransport.org/ खंगाली। लेकिन उस पर ड्रायविंग लायसेंस रिन्यूवल चार्ज मात्र रूपये 250/- लिखा था। आवेदन फार्म का प्रिंट आउट निकालने के लिये कोषिष की लेकिन चाहा गया फार्म ठीक से नहीं निकल पाया, और साथ में सूचना भी आई mponline साईट ठीक से कार्य नहीं कर रही है दोबारा प्रयत्न न करें। सोचा चलो इस बार हम बिना एजेंट के, सीधे ही आर टी ओ कार्यालय जाकर इस काम को करा के देखें।
    गुरूवार का दिन था लगभग साढे ग्यारह बज रहे थे हम अपने दोपहिया से आरटीओ कार्यालय के लिये निकले, शहर के बाहर, जानबूझकर, अत्यंत दुर्गम स्थान पर, अत्यंत खराब सड़क से होते हुए, एक टूटे-फूटे भवन में आरटीओ कार्यालय बनाया गया है जिसकी छत टपक रही थी, कार्यालय के आसपास भरपूर कीचड, गंदगी, गाज़रघास, मख्खियॉं!! मारा रे मारा.....  जो भी व्यक्ति इस कार्यालय तक पहुँच जाये समझें उसका ड्रायविंग टेस्ट लेने की जरूरत ही नहीं होगी, अगर वो सही सलामत कार्यालय पहुँच गया है तो वह परफेक्ट ड्रायवर ही होगा। खैर, आर.टी.ओ. कार्यालय जाकर पूछताछ करना चाहा की ड्रायविंग लायसेंस रिन्यूवल फार्म कहॉं मिलेगा, अन्य फार्मेलिटी क्या होगी वगैरह वगैरह, वहॉं के कर्मचारी ने कहा ‘‘ऑफिस के बाहर पेड़ के नीचे बाबूजी बैठे हैं उनसे बात कीजिये’’ आवाज में तल्खी साफ़ नज़र आ रही थी। उसके जवाब देने के तरीके से समझाने की कोषिष कर रहा था अगले किसी सवाल का जवाब नहीं दूंगा। हमने भी बिना कुछ पूछे बाहर आकर देखा बाबूजी ऑफिस के बाहर पेड़ के नीचे एक टेबल-कुर्सी लगाकर कुछ लोगों के कागजात देख रहे थे। हमने पूछा हमें ड्रायविंग लायसेंस रिन्यूवल करवाना है, बिना गर्दन को ऊपर किये ‘‘सोमवार को आना’’ कह कर फिर अपना कार्य करने लगा। हमने भी अपने पढे-लिखे होने के गर्व में फिर कहा कुछ फार्म वगैरह हो तो दे दीजिये ताकि उसे भरकर ला सकें। ‘‘सोमवार को आना’’ फिर वही जवाब मिला।
    सोमवार को हमने अपनी अकल पर जोर लगाकर अपना राषन कार्ड, वोटर आय-डी, पैन नंबर, ड्रायविंग लायसेंस,यूआयडी सभी की दो-दो फोटोकॉपी और चार-पांच पासपोर्ट फोटो लेकर दोबारा उसी लंका के लिये प्रस्थान किया। बडी परेषानी के बाद पुनः कार्यालय पहुंचे । आज बाबूजी पेड़ के नीचे नहीं थे हमने कार्यालय के अंदर जा कर पूछा पता लगा वे आज दोपहर एक बजे बाद मिलेंगे और सारी फार्मेलिटी भी वही जानते हैं। अब वापस शहर आना और फिर जाना उससे तो अच्छा होगा यहीं कहीं रूका जाये। कार्यालय के अंदर या बाहर ऐसी कोई जगह नहीं थी जिसे उपभोक्ता के दृष्टिकोण से बैठने लायक बनाया गया हो। हॉं, बाहर एक पुराना सा चाय का ठेला जरूर दिखा, समय तो बिताना ही था एक कट चाय पीते हुए उस ठेले वाले से पूछा यार! ये लायसेंस रिन्यूवल के लिये फार्म कहॉं मिलेगा उसने कहा - ‘‘मेरे पास’’, कुछ रूककर फिर बोला ‘‘पांच रूपये लगेंगे’’। उससे फार्म खरीद कर सामान्य जानकारी से भर दिया। हमने दुबारा ठेले वाले से पूछा फोटो चिपकाने के लिये गोंद मिलेगा। ‘‘नहीं, पहले रखा था लोगों ने पूरी की पूरी बॉटल ही मार दी, कैंची और स्टेपलर भी गायब हो गया’’। फिर उसने अपने उस ठेले में कुछ ढूंढने की कोशिश की सेलो टेप मिला, उसी से फोटो चिपका दिया। काफी देर तक इंतजार करने के बाद आखिर बाबूजी के दर्शनों का लाभ मिल ही गया। हमारा आवेदन देखने के पश्चात बोला इस पर मेडीकल नहीं लगा है, एमबीबीएस डाक्टर से फिजिकल फिटनेस का सर्टिफिकेट बनवा लो। मरते क्या न करते फिर लौटे शहर में आकर डाक्टर से रूपये 50 देकर सर्टिफिकेट बनवाया। दोबारा लंका में पहुँच कर आवेदन और सर्टिफिकेट दिया तब बाबूजी बोले रूपये 450/- की रसीद कटवा लीजिये और कल फिर इसी समय आना सीधे कम्प्यूटर पर फोटो खिंचना है। हमने कहा अभी खींच लीजिये बार-बार आना परेशानी भरा है। उसने कहा लेकिन अभी आपरेटर जगह पर नहीं है। इस समस्या का हल मेरे पास भी नहीं था इसलिये चुपचाप कार्यालय के बाहर आ गया। हमारा आवेदन और रसीद जो कायदे से हमारे पास होनी चाहिये, दोनों को उसी ने अपने पास रख लिया था।
    मंगलवार, अगले दिन फिर सुबह साढे ग्यारह बजे हम उसी गंदे धूल भरे रास्ते से आरटीओ कार्यालय पहुंचे। फोटो खिंचवाने वालों की कतार में हम भी शामिल हो गये। बाथरूम से थोडा बडा कमरा उसमे तीन-तीन कम्प्यूटरों पर कुछ कार्य हो रहा था। उसमें से एक कम्प्यूटर पर कार्यरत आपरेटर ने हमारे से नाम पूछकर आवेदन ढूंढते हुए हमसे एक इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड पर साईन करने के लिये कहा, थंब इम्प्रेशन के लिये एक अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण पर अंगुठा रखवाया, फिर एक वेब कैमरे के सामने खडा होने के लिये कहा, हमने आसपास नज़र डाली न तो कहीं आईना था ना कंघी और हॉं चुनाव आयोग वालों ने भी बडी गंदी सी फोटो हमारे मतदाता कार्ड पर छाप रखी है उसे ध्यान में रखते हुए हमने पूछा भाईसाहब आईना कहॉं लगा है। कम्प्यूटर आपरेटर ने जवाब दिया ‘‘अब उसकी कोई आवष्यकता नहीं आपका फोटो तो मैं ले चुका’’। हमारे आश्चर्य का ठिकाना न था। क्योंकि कम्प्यूटर का मॉनीटर उसकी और था और वो उस पर क्या कर रहा है हमें काउंटर के बाहर खडे होकर कुछ नज़र भी नहीं आ रहा था। और अचानक उसका जवाब ‘‘फोटो तो मैं ले चुका अब आप चार पांच दिन बाद आकर अपना कार्ड ले जाना’’।
    अगले शुक्रवार को आरटीओ कार्यालय के नाम से ही घबराहट हो रही थी फिर भी जैसे तैसे वहॉं पहुँच कर अपना नया ड्रायविंग लायसेंस प्राप्त करना चाहा तो उस पर फिर हमसे 20 रूपये लेकर शसस्त्र सेना झण्डा दिवस का टिकट चिपकाया गया....  क्यों!   नहीं पता। हमें कार्ड पर अपना फोटो निहारते हुए देखकर आपरेटर ने कहा ‘‘यह आपका ही फोटो है’। हमने भी उस कार्ड को जेब में रखकर चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी, लेकिन अब तक फार्म, सायबर केफे, डाक्टर, फोटोकापी और पेट्रोल के खर्चे को मिलाकर लगभग हमारे रूपये 750 से अधिक पूरे हो चुके थे।
क्या एक ईमानदार, सामान्य नागरिक होना सजा है? क्या एजेंट के रूपये 500/- देकर भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा बनना ठीक होगा? क्या किया जाये?

होना क्या चाहिये।
  • आर.टी.ओ कार्यालय शहर के बीच में ही कहीं हो। (टेस्ट ड्राईव को छोडकर सारे कार्य शहर में ही किये जा सकते हैं )
  • सभी प्रकार की सामान्य फार्मेलिटी, चार्ज व आवेदन प्रारूपों से संबंधित एक पुस्तिका जो आसानी से कार्यालय में ही उपलब्ध हो।
  • सभी काउंटरों के बारे में उनका विस्तृत विवरण जैसे यहॉं क्या क्या होता है उसी पुस्तिका में उपलब्ध हो।
  • कार्यालय स्तर पर ही फोटोकॉपी, गोंद आदि की सुविधा हो।
  • उपभोक्ताओं के बैठने की उचित व्यवस्था हो।
  • एक उपभोक्ता के सभी कार्य एक कार्यदिवस में पूरा हो सके ऐसी व्यवस्था हो।
  • पेन कार्ड या यूनिक आय डी की तरह इसे भी ठेका पद्धति पर करवाते हुए सभी सरकारी कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी जावे।

Saturday, August 20, 2011

रतलाम विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पद पर कौन होना था।

निर्माण सामग्री सप्लायर का व्यवसाय करने वाले से प्राप्त ।
रतलाम विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पद के लिये किस व्यक्ति को रखा जाना चाहिये था। जिसने कभी सिविल इंजिनियरिंग पढ़ा हो, जिसको शहर के विकास का कोई थोडा बहुत भी पूर्व अनुभव हो, कई बडे शहरों में घूमकर उसने विभिन्न प्रकार के निर्माण पर कोई शोध किया हो, लगातार वह इस क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय कार्य कर रहा हो लेकिन नहीं किसी भी चारण भाट को इस पद पर नियुक्त करवा कर क्या हमारा रतलाम विकसित हो सकेगा। यहॉं हमारे रतलाम में क्या होता है पहले शहर सराय के चौराहे पर पानी का फव्वारा बनाया जाये ताकि उसमें भ्रष्टाचार हो सके। फिर अगली परिषद उसे तुडवाकर इंडिया गेट बनवाये ताकि दुबारा भ्रष्टाचार हो सके। पहले सैलाना बस स्टैंड पर गोल सर्कल था उसे हटाकर महाराणा प्रताप की मूर्ति स्थापित की अब उसे हटाकर फिर से दूसरी जगह स्थापित करेंगे तभी तो कुछ भ्रष्टाचार पर काम बनेगा।
रतलाम के लोग तो वैसे भी धार्मिक कथाओं में व्यस्त रहने के आदि हैं एक संत को बुलाओ और इनको बिझी रखो। उनके सोचने समझने की शक्ति को मुर्च्छित अवस्था में बनाये रखो और जितना हो सके उतना इस शहर का सत्यानाश करो। भ्रष्टाचार के विरूद्ध जितना अच्छा नाटक ये लोग कर सकते हैं उतना कोई और नहीं कर सकता। बहुत ही समझु टाईप के हैं भोले भाले रतलामी, कोई नहीं पूछता है कि क्या ये महाराणा की मूर्ति को यहॉं स्थापित करने के पहले कोई अक्ल का इस्तेमाल करने की जरूरत समझी गयी थी या नहीं। 
वैसे भी रतलाम के बारे में एक मशहूर कहावत है कि किसी जमाने में किसी आदिवासी ने कहीं चलते हुए कोई पगडंडी बनायी थी तो रतलाम नगर निगम ने उस पर डामर पोत कर उसे रोड मान लिया। कोई सीधी लाईन बनाना नहीं जानता, सारी सडकें जलेबी जैसी हैं विकास प्राधिकरण बनाने से ये जलेबी सीधी नहीं होगी। रतलाम बनाने वाले को जलेबी पसंद होगी
पान की दुकान से प्राधिकरण अध्यक्ष तक, आटा चक्की से निगम अध्यक्ष तक। क्या ये पढे लिखे तार्किक बुद्धि वाले लोगों का शहर है? क्या रतलाम के सभी सिविल इंजिनियर, ठेकेदार, वास्तु विशेषज्ञ, भवन निर्माण सामाग्री व्यवसायियों के मुंह पर यह तमाचा नहीं है?
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