श्री मनोहर वर्मा, रतलाम से प्राप्तः
सुबह आठ बजे हमें मोबाईल पर एक एसएमएस आया, आपके ड्रायविंग लायसेंस रिन्यूवल का समय आ गया है, आप सोच रहे हैं ऐसा एसएमएस हमें तो नहीं मिला आज तक! बिल्कुल ठीक, यातायात विभाग की और से ऐसा कोई एसएमएस नहीं भेजा जाता वो तो हमने इंटरनेट की उन ठेरों वेब साईटस् में से एक पर अपने खुद के लिये ये रिमांइडर सेट किया था जो इस प्रकार की सुविधा देती है। खैर, हमने तुरंत अपना ड्रायविंग लायसेंस निकालकर चेक किया, बिल्कुल सही आखरी सात दिन शेष थे।
लगभग ग्यारह बजे यातायात विभाग का कार्य देखने वाले एक एजेंट के कार्यालय में जाकर पूछताछ की, एक साधारण से दोपहिया के
ड्रायविंग लायसेंस रिन्यूवल का चार्ज रूपये 500/- बताया गया। साथ में तीन पासपोर्ट फोटो भी लाने के लिये कहा गया। वहॉं से सीधे सायबर केफे पर जाकर डिपार्टमेंट ऑफ ट्रांसपोर्ट की बेब साईट http://www.mptransport.org/ खंगाली। लेकिन उस पर ड्रायविंग लायसेंस रिन्यूवल चार्ज
मात्र रूपये 250/- लिखा था। आवेदन फार्म का प्रिंट आउट निकालने के लिये कोषिष की लेकिन चाहा गया फार्म ठीक से नहीं निकल पाया, और साथ में सूचना भी आई mponline साईट ठीक से कार्य नहीं कर रही है दोबारा प्रयत्न न करें। सोचा चलो इस बार हम बिना एजेंट के, सीधे ही आर टी ओ कार्यालय जाकर इस काम को करा के देखें।
गुरूवार का दिन था लगभग साढे ग्यारह बज रहे थे हम अपने दोपहिया से
आरटीओ कार्यालय के लिये निकले, शहर के बाहर, जानबूझकर, अत्यंत दुर्गम स्थान पर, अत्यंत खराब सड़क से होते हुए, एक टूटे-फूटे भवन में आरटीओ कार्यालय बनाया गया है जिसकी छत टपक रही थी, कार्यालय के आसपास भरपूर कीचड, गंदगी, गाज़रघास, मख्खियॉं!! मारा रे मारा..... जो भी व्यक्ति इस कार्यालय तक पहुँच जाये समझें उसका ड्रायविंग टेस्ट लेने की जरूरत ही नहीं होगी, अगर वो सही सलामत कार्यालय पहुँच गया है तो वह परफेक्ट ड्रायवर ही होगा। खैर, आर.टी.ओ. कार्यालय जाकर पूछताछ करना चाहा की ड्रायविंग लायसेंस रिन्यूवल फार्म कहॉं मिलेगा, अन्य फार्मेलिटी क्या होगी वगैरह वगैरह, वहॉं के कर्मचारी ने कहा
‘‘ऑफिस के बाहर पेड़ के नीचे बाबूजी बैठे हैं उनसे बात कीजिये’’ आवाज में तल्खी साफ़ नज़र आ रही थी। उसके जवाब देने के तरीके से समझाने की कोषिष कर रहा था अगले किसी सवाल का जवाब नहीं दूंगा। हमने भी बिना कुछ पूछे बाहर आकर देखा बाबूजी ऑफिस के बाहर पेड़ के नीचे एक टेबल-कुर्सी लगाकर कुछ लोगों के कागजात देख रहे थे। हमने पूछा हमें ड्रायविंग लायसेंस रिन्यूवल करवाना है, बिना गर्दन को ऊपर किये
‘‘सोमवार को आना’’ कह कर फिर अपना कार्य करने लगा। हमने भी अपने पढे-लिखे होने के गर्व में फिर कहा कुछ फार्म वगैरह हो तो दे दीजिये ताकि उसे भरकर ला सकें।
‘‘सोमवार को आना’’ फिर वही जवाब मिला।
सोमवार को हमने अपनी अकल पर जोर लगाकर अपना राषन कार्ड, वोटर आय-डी, पैन नंबर, ड्रायविंग लायसेंस,यूआयडी सभी की दो-दो फोटोकॉपी और चार-पांच पासपोर्ट फोटो लेकर दोबारा उसी लंका के लिये प्रस्थान किया। बडी परेषानी के बाद पुनः कार्यालय पहुंचे । आज बाबूजी पेड़ के नीचे नहीं थे हमने कार्यालय के अंदर जा कर पूछा पता लगा वे आज दोपहर एक बजे बाद मिलेंगे और सारी फार्मेलिटी भी वही जानते हैं। अब वापस शहर आना और फिर जाना उससे तो अच्छा होगा यहीं कहीं रूका जाये। कार्यालय के अंदर या बाहर ऐसी कोई जगह नहीं थी जिसे उपभोक्ता के दृष्टिकोण से बैठने लायक बनाया गया हो। हॉं, बाहर एक पुराना सा चाय का ठेला जरूर दिखा, समय तो बिताना ही था एक कट चाय पीते हुए उस ठेले वाले से पूछा यार! ये लायसेंस रिन्यूवल के लिये फार्म कहॉं मिलेगा उसने कहा -
‘‘मेरे पास’’, कुछ रूककर फिर बोला
‘‘पांच रूपये लगेंगे’’। उससे फार्म खरीद कर सामान्य जानकारी से भर दिया। हमने दुबारा ठेले वाले से पूछा फोटो चिपकाने के लिये गोंद मिलेगा।
‘‘नहीं, पहले रखा था लोगों ने पूरी की पूरी बॉटल ही मार दी, कैंची और स्टेपलर भी गायब हो गया’’। फिर उसने अपने उस ठेले में कुछ ढूंढने की कोशिश की सेलो टेप मिला, उसी से फोटो चिपका दिया। काफी देर तक इंतजार करने के बाद आखिर बाबूजी के दर्शनों का लाभ मिल ही गया। हमारा आवेदन देखने के पश्चात बोला इस पर मेडीकल नहीं लगा है, एमबीबीएस डाक्टर से फिजिकल फिटनेस का सर्टिफिकेट बनवा लो। मरते क्या न करते फिर लौटे शहर में आकर डाक्टर से रूपये 50 देकर सर्टिफिकेट बनवाया। दोबारा लंका में पहुँच कर आवेदन और सर्टिफिकेट दिया तब बाबूजी बोले रूपये 450/- की रसीद कटवा लीजिये और कल फिर इसी समय आना सीधे कम्प्यूटर पर फोटो खिंचना है। हमने कहा अभी खींच लीजिये बार-बार आना परेशानी भरा है। उसने कहा लेकिन अभी आपरेटर जगह पर नहीं है। इस समस्या का हल मेरे पास भी नहीं था इसलिये चुपचाप कार्यालय के बाहर आ गया। हमारा आवेदन और रसीद जो कायदे से हमारे पास होनी चाहिये, दोनों को उसी ने अपने पास रख लिया था।
मंगलवार, अगले दिन फिर सुबह साढे ग्यारह बजे हम उसी गंदे धूल भरे रास्ते से आरटीओ कार्यालय पहुंचे। फोटो खिंचवाने वालों की कतार में हम भी शामिल हो गये। बाथरूम से थोडा बडा कमरा उसमे तीन-तीन कम्प्यूटरों पर कुछ कार्य हो रहा था। उसमें से एक कम्प्यूटर पर कार्यरत आपरेटर ने हमारे से नाम पूछकर आवेदन ढूंढते हुए हमसे एक इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड पर साईन करने के लिये कहा, थंब इम्प्रेशन के लिये एक अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण पर अंगुठा रखवाया, फिर एक वेब कैमरे के सामने खडा होने के लिये कहा,
हमने आसपास नज़र डाली न तो कहीं आईना था ना कंघी और हॉं चुनाव आयोग वालों ने भी बडी गंदी सी फोटो हमारे मतदाता कार्ड पर छाप रखी है उसे ध्यान में रखते हुए हमने पूछा भाईसाहब आईना कहॉं लगा है। कम्प्यूटर आपरेटर ने जवाब दिया
‘‘अब उसकी कोई आवष्यकता नहीं आपका फोटो तो मैं ले चुका’’। हमारे आश्चर्य का ठिकाना न था। क्योंकि कम्प्यूटर का मॉनीटर उसकी और था और वो उस पर क्या कर रहा है हमें काउंटर के बाहर खडे होकर कुछ नज़र भी नहीं आ रहा था। और अचानक उसका जवाब
‘‘फोटो तो मैं ले चुका अब आप चार पांच दिन बाद आकर अपना कार्ड ले जाना’’।
अगले शुक्रवार को आरटीओ कार्यालय के नाम से ही घबराहट हो रही थी फिर भी जैसे तैसे वहॉं पहुँच कर अपना नया ड्रायविंग लायसेंस प्राप्त करना चाहा
तो उस पर फिर हमसे 20 रूपये लेकर शसस्त्र सेना झण्डा दिवस का टिकट चिपकाया गया.... क्यों! नहीं पता। हमें कार्ड पर अपना फोटो निहारते हुए देखकर आपरेटर ने कहा ‘‘यह आपका ही फोटो है’। हमने भी उस कार्ड को जेब में रखकर चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी, लेकिन अब तक फार्म, सायबर केफे, डाक्टर, फोटोकापी और पेट्रोल के खर्चे को मिलाकर लगभग हमारे रूपये 750 से अधिक पूरे हो चुके थे।
क्या एक ईमानदार, सामान्य नागरिक होना सजा है? क्या एजेंट के रूपये 500/- देकर भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा बनना ठीक होगा? क्या किया जाये?
होना क्या चाहिये।
- आर.टी.ओ कार्यालय शहर के बीच में ही कहीं हो। (टेस्ट ड्राईव को छोडकर सारे कार्य शहर में ही किये जा सकते हैं )
- सभी प्रकार की सामान्य फार्मेलिटी, चार्ज व आवेदन प्रारूपों से संबंधित एक पुस्तिका जो आसानी से कार्यालय में ही उपलब्ध हो।
- सभी काउंटरों के बारे में उनका विस्तृत विवरण जैसे यहॉं क्या क्या होता है उसी पुस्तिका में उपलब्ध हो।
- कार्यालय स्तर पर ही फोटोकॉपी, गोंद आदि की सुविधा हो।
- उपभोक्ताओं के बैठने की उचित व्यवस्था हो।
- एक उपभोक्ता के सभी कार्य एक कार्यदिवस में पूरा हो सके ऐसी व्यवस्था हो।
- पेन कार्ड या यूनिक आय डी की तरह इसे भी ठेका पद्धति पर करवाते हुए सभी सरकारी कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी जावे।